साड़ी और भारतीय समाज

साड़ी हमारे भारतीय समाज की विरासत है। यह एक सम्पूर्ण भारतीय वस्त्र है। साड़ी नारी की शालीनता और सादगी की परिचायक होती है। साड़ियों पर जो कसीदाकारी होती है, उसके पीछे का इतिहास शायद आप न जानते हो। यह 3500 वर्ष पुराना इतिहास है। कई गांव कई पीढ़ियों से इस कार्य में जुटे हैं। काफी वक्त लगता है एक संपूर्ण साड़ी बनाने में। इसको बनाने वाले कारीगरों की अपनी-अपनी शैली होती है और सभी कारीगर अपनी शैली के अनुसार साड़ियों के डिज़ाइन तैयार करते हैं।

साड़ी कलात्मकता की परिचायक है। भारतीय समाज में साड़ी का अपना अलग ही महत्व है। धर्म और आस्था के बारे में साड़ी को पहनने वाली महिलाओं की बेशक अलग अलग राय हो सकती है, परन्तु साड़ी भारतीयता की प्रतीक है, ऐसा सब मानती हैं।

दुनियाँ के सबसे प्राचीन ग्रंथ कहे जाने वाले वेदों में भी इसका प्रमाण मिलता है। सबसे पहले साड़ी का उल्लेख यजुर्वेद में पाया जाता है। ऋग्वेद संहिता के अनुसार होम या यज्ञ करते समय यजमान की पत्नी द्वारा साड़ी पहनने का विधान है। क्योंकि, भारतीय संस्कृति वेदों पर आधारित संस्कृति है, इसलिए वेदों के आधार पर साड़ी पहनना भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया।

समय के साथ-साथ इस पर निरंतर बहुत से प्रयोग होते रहे हैं। महाभारत में भी साड़ी का प्रमाण मिलता है। दुर्योधन द्वारा द्रोपदी का चीरहरण और श्री कृष्ण जी द्वारा द्रोपदी का चीयर बढ़ाए जाने के प्रसंग को सभी भली-भांति जानते हैं। इस प्रसंग से पता चलता हैं कि साड़ी नारी की अस्मिता की भी प्रतीक है। यह केवल एक वस्त्र मात्र ही नहीं है बल्कि इससे बहुत बढ़कर है।

प्राचीन मूर्तियों में भी साड़ी का प्रमाण मिलता है। सभी देवियों की मूर्तियां भी साड़ी से ही सुशोभित हैं। साड़ी भारतीयता का एहसास कराती है, और नारी को मनमोहक रूप प्रदान करती है। स्पष्ट है कि भारतीय समाज में साड़ी का जो स्थान है, वह कोई और वस्त्र ले ही नहीं सकता।

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